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<title>Urge to Fly - hindi</title>
<description>Urge to Fly</description>
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<lastBuildDate>Thu, 10 Dec 2009 11:09:20 +0530</lastBuildDate>
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<title>Gulzar's Moon</title>
<link>http://urgetofly.blogspirit.com/archive/2006/08/03/gulzar-s-moon.html</link>
<author>noreply@blogspirit.com (Khwaahish-e-Parwaaz)</author>
<category>Hindi</category>
<category>Poetry</category>
<pubDate>Thu, 03 Aug 2006 14:15:00 +0530</pubDate>
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&lt;font size=&quot;4&quot;&gt;&lt;strong&gt;चाँद गुलज़ार का &lt;/strong&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;http://urgetofly.blogspirit.com/images/thumb_spgul.jpg&quot; alt=&quot;medium_spgul.jpg&quot; style=&quot;border-width: 0; float: left; margin: 0.2em 1.4em 0.7em 0;&quot; /&gt;&lt;font size=&quot;2.5&quot;&gt;चाँद और कवियों का बड़ा ही पुराना रिश्ता है। शायद ही कोई ऐसा कवि या शायर होगा जो चाँद से प्रेरित न हुआ हो। पूर्णिमा का सम्पूर्ण गोलाकार चन्द्र होता ही इतना मोहक है कि भला कौन उससे प्रेरित हुए बिना रह सकता है? यदि हम समय के उस दूसरे छोर पर जायें जहाँ संसार की पहली कविता का सृजन हुआ हो, और फिर वहाँ से कविता के इतिहास का पल्ला पकड़ कर आज तक का सफ़र तय करें, तो निश्चय ही हम पायेंगे कि पीढ़ी दर पीढ़ी कवियों ने चाँद को सुन्दरता का प्रतीक माना है। फलस्वरूप कविता में ‘चाँद’ के उपयोग का दायरा कुछ महदूद सा रह गया है। महबूबा के हुस्न की तुलना से आगे जैसे चाँद का कुछ वजूद ही नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक कवि जिन्होंने अपनी कविताओं में चाँद को एक बहुआयामी व्यक्तित्व और अनगिनत संभावनाओं के साथ प्रस्तुत किया है, वो हैं गुलज़ार। गुलज़ार का चाँद एक बहरूपिया है। कभी वो रोटी बन जाता है, तो कभी भीख का कटोरा; कभी भीख में दी गयी कौडी, तो कभी एक फल जो पक कर पेड से टपक जाए। कभी वो कुहनियों के बल चल कर शरारत पे आमादा हो जाता है, तो कभी पुखराजी पीला रंग ले कर सुस्त पड़ जाता है। एक तरफ़ वो अब्र की मैली सी गठरी में छिपा चमकता खन्जर है, तो दूसरी ओर एक चमकती हुई अठन्नी। कभी एक चिकनी डली जो घुली जाती है, तो कभी दामन-ए-शब पर लगा हुआ एक पैबन्द। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिसाल के लिये:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1&lt;br /&gt;&lt;em&gt;माँ ने इक&lt;/em&gt;&lt;/font&gt;&amp;#8230;
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<title>जन्मदिन</title>
<link>http://urgetofly.blogspirit.com/archive/2006/06/19/जन्मदिन.html</link>
<author>noreply@blogspirit.com (Khwaahish-e-Parwaaz)</author>
<category>Hindi</category>
<category>Introspection</category>
<pubDate>Mon, 19 Jun 2006 19:00:00 +0530</pubDate>
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&lt;font size=&quot;2.5&quot;&gt;&lt;em&gt;वो उम्र कम कर रहा था मेरी&lt;br /&gt;मैं साल अपने बढ़ा रहा था&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुलज़ार साहब का यह एक शे’र मुझे बहुत पसन्द है। एक सीधी सी बात बहुत ही आसान लफ़्ज़ों में बयान की गयी है; लेकिन ये फ़लसफ़ा हक़ीक़त के कितना क़रीब है? आज जब मेरा जन्मदिन है, ये शे’र मेरे ज़ेहन में बारहा गूँज रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक वक़्त था जब मैं इस दिन अपनी गुज़श्ता ज़िन्दगी के सफ़र पर निकल पड़ता था। ये एक ज़रिया था अपनी ज़िन्दगी की आशा और निराशा, नशेब-ओ-फ़राज़, उपलब्धियों और असफलताओं के आंकलन का। एक मुसाहिब की तरह जो नामा-ए-ज़िन्दगी में सूद-ओ-ज़ियाँ का हिसाब रखता है। लेकिन अब मैं इस वार्षिक कार्यकलाप में अपना समय व्यर्थ नहीं करता हूँ। भला क्यों? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा ये मानना है कि जहां एक तरफ़ अपनी गुज़री हुई ज़िन्दगी का जायज़ा लेने में अपनी ग़लतियों से सीख लेने का लाभ अवश्य है, वहीं दूसरी ओर एक ख़तरा भी है – अपने माज़ी में जीने का। साल दर साल मैंने पाया कि इस क्रिया से मुझे लाभ कम और हानि अधिक हुई है। जब-जब मैं इस पुनरावलोकन की क्रिया में उतरता, मेरा मन बस अतीत की निराशा और दुख में जा अटकता। और फिर उससे अपना दामन खेंच पाना मेरे इख़्तियार से बाहर हो जाता। नतीजा ये कि अपने माज़ी से सीख ले कर अपने मुस्तक़बिल को संवारने कि बजाए मेरा वर्तमान भी अतीत की सियाह रोशनी से घिर जाता। सालगिरह एक ख़ुशी का अवसर होता है, इस दिन ग़मों के आग़ोश में रहना निहायत बेवक़ूफ़ी ही है। इस आत्मघाती चक्र&lt;/font&gt;&amp;#8230;
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<title>तामील-ए-हुक्म (Execution of Command)</title>
<link>http://urgetofly.blogspirit.com/archive/2006/06/17/तामील-ए-हुक्म-execution-of-command.html</link>
<author>noreply@blogspirit.com (Khwaahish-e-Parwaaz)</author>
<category>Hindi</category>
<category>Poetry</category>
<pubDate>Sat, 17 Jun 2006 17:00:00 +0530</pubDate>
<description>
&lt;font size=&quot;2.5&quot;&gt;&lt;br /&gt;लो हुक्म-ए-तर्क-ए-रब्त की तामील हो गयी&lt;br /&gt;अफ़्सोस है फ़क़त यही ताजील हो गयी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क़ुर्बत हुआ जो करती थी गुफ़्तार में कभी&lt;br /&gt;ऐ हैफ़ फ़ासलों में क्यूँ तब्दील हो गयी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ुद को दिया फ़रेब मुहब्बत के नाम पर&lt;br /&gt;अच्छा हुआ कि बात की तफ़्सील हो गयी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तक़्सीरवार बोलिये ठहराएँ किस को हम&lt;br /&gt;अपना ही था क़ुसूर जो तज़्लील हो गयी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रखेगा याद हम को भी हर हाल में जहाँ&lt;br /&gt;हस्ती हमारी दर्द की तम्सील हो गयी&lt;br /&gt;&lt;/font&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुक्म = order, command; तर्क = abandonment, desertion; रब्त = connection, relationship; तामील = execution (of command); ताजील  = haste&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क़ुर्बत  = closeness; गुफ़्तार = conversation; हैफ़  = Alas!; तब्दील  = change, modification, alterasion, conversion&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़रेब  = delusion; तफ़्सील  = explanation, analysis, clarification&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तक़्सीरवार  = guilty; क़ुसूर  = fault; तज़्लील = debasement, humiliation&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हस्ती  = existence; तम्सील = example, allegory, comparison
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<title>प्रेरणा</title>
<link>http://urgetofly.blogspirit.com/archive/2006/06/09/प्रेरणा.html</link>
<author>noreply@blogspirit.com (Khwaahish-e-Parwaaz)</author>
<category>Hindi</category>
<category>Poetry</category>
<pubDate>Fri, 09 Jun 2006 06:25:00 +0530</pubDate>
<description>
&lt;font size=&quot;2.5&quot;&gt;मेरी कविताओं के संदर्भ में लोग अक्सर मेरे समक्ष एक प्रश्न रखते हैं। भला मुझे कविता लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिलती है? इस का उत्तर देना मेरे लिये इतना आसान नहीं। सच मानिये तो कोई भी कवि इस प्रश्न का उत्तर आसानी से नहीं दे सकेगा। जहाँ तक मेरी बात है, मेरी कविताओं के प्रेरणा स्रोत इतने विविध और भिन्न हैं कि मेरे लिये उनका व्याख्यान करना सम्भव नहीं। कभी मेरे जीवन के अनुभव कविता का रूप धारण कर कोरे पृष्ठ पर अवतरित हो जाते हैं, तो कभी दूसरों पर गुज़रते हालात छन्दों या शे'रों में परिवर्तित हो जाते है। कभी तो औरों की लिखी कविता से भी मैं प्रेरित हो जाता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिये ये शे’र पढ़िये –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;शहर में तो रुख़सती दहलीज़ तक महदूद है&lt;br /&gt;गाँव में पक्की सड़क तक लोग पहुँचाने गये।&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है न एक निहायत उम्दा और बलीग़ शे’र? ये मेरे एक मित्र ने लिखा है। जब ये शे’र मैने पहली बार सुना, मुझ पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि मुझे अपनी तमाम शायरी इस एक शे’र के आगे फीकी लगी। ये दो मिसरे अपने आप में कितना गहरा फ़लसफ़ा समेटे हुए हैं। मैं इतना अधिक प्रभावित हुआ इस शे’र से कि मैने इसी &lt;em&gt;‘तरह’ &lt;/em&gt;(&lt;em&gt;बहर&lt;/em&gt;, &lt;em&gt;क़ाफ़िया &lt;/em&gt;और &lt;em&gt;रदीफ़ &lt;/em&gt;का निरधारण) में एक पूरी ग़ज़ल कहने की ठान ली। वैसे ये इतना आसान नहीं था। दो-तीन शे’र तो मैने तुरन्त लिख लिये, परन्तु सही ‘&lt;em&gt;मतला&lt;/em&gt;’ मिलने के कुछ महीने लग गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आख़िरकार मेरी ग़ज़ल तैयार है – हालांकि मुझे नहीं लगता कि मेरी पूरी ग़ज़ल&lt;/font&gt;&amp;#8230;
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<guid isPermaLink="true">http://urgetofly.blogspirit.com/archive/2006/05/19/मैं-कौन-हूँ.html</guid>
<title>मैं कौन हूँ?</title>
<link>http://urgetofly.blogspirit.com/archive/2006/05/19/मैं-कौन-हूँ.html</link>
<author>noreply@blogspirit.com (Khwaahish-e-Parwaaz)</author>
<category>Hindi</category>
<category>Introspection</category>
<category>Poetry</category>
<pubDate>Fri, 19 May 2006 16:50:00 +0530</pubDate>
<description>
&lt;font size=&quot;2.5&quot;&gt;मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कैसा हूँ इतना तो आत्मज्ञान है,&lt;br /&gt;किन्तु चलो स्वयं को आज औरों के दृष्टिकोण से &lt;br /&gt;बस एक झलक देखा जाये ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं भावुक नहीं -&lt;br /&gt;क्षमता नहीं परभावना का आदर करने की मुझ में&lt;br /&gt;और न है सामर्थ्य ही निजी मूक भावनाओं की &lt;br /&gt;अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति का ।&lt;br /&gt;पाषाण हृदय मनुष्य हूँ मैं …&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझ में है साहस नहीं –&lt;br /&gt;जितनी जटिल समस्याएँ जीवन में आती जाती हैं&lt;br /&gt;स्वयं समाधान उनका मैं निकाल तो पाता नहीं&lt;br /&gt;यथार्थ नकार देता हूँ।&lt;br /&gt;संकेत है यह कायरता का …&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा कुछ उद्देश्य नहीं -&lt;br /&gt;न लालसा यशोधन की न अर्थसिद्धि का है संकल्प;&lt;br /&gt;राग अस्तित्व का समस्वर और सुस्त गति है जीवन की&lt;br /&gt;किन्तु पूर्णतः संतुष्ट हूँ।&lt;br /&gt;कितना लक्ष्य रहित है जीवन …&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझ में सच्चाई नहीं –&lt;br /&gt;बाह्य रूप मेरा अलग है, आन्तरिक कुछ भिन्न है&lt;br /&gt;रहस्य दुर्बलता का अपनी सबसे छुपाने के लिये&lt;br /&gt;एक मुखौटा पहना है।&lt;br /&gt;कहते हैं पाखण्ड इसी को …&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निष्ठुर, कायर, निरुद्देश्य, दुमुखी और पाखण्डी&lt;br /&gt;और एक दोष है – रहता हूँ अपने मत पर मैं अडिग &lt;br /&gt;और मेरा यह मत है  कि औरों के दृष्टिकोण से &lt;br /&gt;कदापि मैं सहमत नहीं।&lt;br /&gt;&lt;/font&gt;
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